खुद क्या करति, नहीं सोचति ये दुनिया
दूसरों के कर्म पर ध्यान देति।
मैं ने भी ठान लि,
अब इस कि न चलने दूँगी ।
क्यों भूल जाति है , अपने बारे में सोचना
और वक्त मिल जाता है , हमारी खामियो को पहचाने में ।
क्यों फिकर करु में उसकी
जो खुशी नहीं देख पाती मेरी
पर हर जख्म को है कूरेदति ।
ऐ "दुनिया" में ने भी ठान ली है
अब नहीं चलने दूंगी तेरी
क्योंकि है ये " जिंदगी " सिर्फ़ मेरी ।
बिंदु अनुराग