आशाओं से आच्छादित जीवन
मृत्यु शैया पर भी
आशाओं से विरत न हो सका
प्रभु की भक्ति में
मन रम ना सका।
अपनी व्यथा की कथा
सुनाने में ही वक्त बीत गया
मृत्यु का क्षण आ गया
शरीर से आत्मा मुक्त हुई
उसकी सकारात्मकता
सृजन के रूप मंे
स्मृति में अमर हो गई
नकारात्मकता देह के साथ
अग्नि में भस्म हो गई।
उसकी स्मृति में
सबकी आंखों से
गंगा की पवित्रता के समान
दो आंसू बह निकले
जो करूण रूदन में कही खो गए
जीवन का प्रारंभ से अंत है
या अंत से प्रारंभ
हम इसे समझने में ही
अपने आप में खो गए।