प्रभु दर्शन
डा. राजकुमार तिवारी ’सुमित्र’ (81 वर्ष) साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में प्राण-पण से सक्रिय व समर्पित रहते है। वे दैनिक नवीन दुनिया के पूर्व संपादक, दैनिक जयलोक के सलाहकार संपादक, महाकौशल हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष एवं कई संस्थाओं से जुडे हुये है। उनका मानना है कि मृत्यु अटल सत्य है किंतु अब जीवन सीमित है यह सोच, समय के पहले ही मृत्यु का आभास कराने लगती है और हम सकारात्मकता छोड़कर नकारात्मकता की ओर अनजाने में ही बढ़ जाते है। मेरे अनुसार हमारी दृष्टि सकारात्मक होना चाहिए और जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण मानते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से जीना चाहिए। इससे हमारे मन में ज्ञान की जिज्ञासा बढे़गी और हमें पढ़ने लिखने की ओर प्रेरित करेगी।
कुछ वर्ष पूर्व मैं अपनी बुआ एवं अन्य परिजनों के साथ चित्रकूट गया था। सायं हम लोग तैयार होकर होटल से बाहर निकले। अंधेरा उतर आया था। हम लोग सडक पर आकर आगे बढ़े कि बुआ ने आवाज दी- कहा देखो सड़क के उस पार झाँकी सजी है, चलो दर्शन कर लें। हम सब ने बालरूप राम, लक्ष्मण, जानकी के दर्शन किये, आरती की। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। वहाँ पीतवस्त्रधारी एक वृद्ध भी बैठे थे। दर्शन कर हम मुश्किल से पचास कदम आगे बढे होंगे तभी बुआ ने आवाज दी और कहा कि भैया झाँकी ? हम लोगों ने देखा- वहाँ कुछ नही था। प्रश्नाकुल मन लिये हम लोग प्रमोद वन के कार्यक्रम में गये। वहाँ से लौटकर फिर देखा, झाँकी की जगह कुछ नही था। सुबह जल्दी उठकर फिर देखा, एक दीवार थी, झोपडी या झाँकी का कोई निशान नही था। सोचा कि मंडली वाले होंगे। शाम तक पता चला कि उस वर्ष वहाँ एक भी मंडली नही आई थी। फिर झाँकी ? रात को चर्चा करते करते हम सब की आँखों से अश्रुपात हो रहा था। क्या प्रभु ने दर्शन दिये थे ? क्या झाँकी एक भ्रम थी ? क्या एक साथ पाँच व्यक्ति भ्रमित हो सकते है ? यह घटना अविश्वसनीय परंतु सत्य है।
जीवन में अपेक्षाओं का अंत नही है परंतु जो कुछ भी हमें प्रभु कृपा से प्राप्त हुआ हो उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और मन में यह भाव रखना चाहिए कि ईश्वर ने हमें हमारी आवश्यकताओं से अधिक ही प्रदान किया है। इससे हमें हमेशा संतुष्टि, सुख एवं तृप्ति का अनुभव होगा।