हे राम
हे राम अनेकों बार तुम्हीं
मेरे अन्दर-बाहर रहते हो,
सुख का सागर निर्मित कर
तुम दुख सारे पी जाते हो।
मैं कृतज्ञ बन झुक जाता हूँ
पर पीड़ा पर रूक जाता हूँ,
जब आगे-आगे तुम होते हो
पीड़ा सारी हर लेते हो।
सदा सत्य पर तुम मिलते हो
विपदा में संग रहते हो,
सुर अनेकों तुम चुनते हो
दया भाव दे देते हो।
जीवन समझने मैं चलता हूँ
ठोकर निर्मम खा लेता हूँ,
सुख सागर की ओर निकल कर
दुख पर लेप लगा लेता हूँ।
हे राम तुम्हारी खुशबू में
संसार समाया लगता है,
एक क्षण ऐसा आता है
जब ब्रह्मांड खोलना पड़ता है।
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* महेश रौतेला