तुम्हारी प्रार्थना में
धन्यवाद का भाव आएगा,
तभी, वह कबूल होगी।
तुम्हारी सारी प्राथनाएं
तुम्हारी शिकायतें हैं और
प्राथना कहीं
शिकायत हो सकती है ?
तुम उसी दिन मंदिर पहुंच पाओगे
जिस दिन तुम धन्यवाद देने जाओगे,
जिस दिन तुम कहने जाओगे कि
मैं किसी योग्य न था।
प्राथना का कोई अंत नहीं है।
वह बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है
और एक घड़ी ऐसी आती है कि
तुम्हारी पात्रता शून्य हो जाती है।
उस शून्य पात्र में ही
सारा अस्तित्व उतर आता है।🙏🙏