*प्रभात दर्शन*
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कृते प्रतिकृतिं कुर्यात्
हिंसेन प्रतिहिंसनम्,
तत्र दोषो न पतति दुष्टे
दौष्ट्यं समाचरेत्॥
भावार्थ :- उपकारी के साथ उपकार, हिंसक के साथ प्रतिहिंसा करनी ही चाहिए तथा दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है। यही शास्त्र सम्मत है।