कब तक
ऐसे तो आती है अमावस हर माह
पर मै तो सालों से भर रही हूं आह
जाने कब आएगी चांद रात लेके, कोई माह
क्यू की कभी न धरी तुने यह नाज़ुक बांह;
न तो कभी मिली मुझे तेरी बाहों में पनाह ।
जाने कब होगी पूर्णिमा; सालों से देखती हूं राह ।
सालों का इंतजार होगा न पूरा; आएगी न कभी पूर्णिमा;
न खिलगा चांद कभी इस आंगन में; बस सुनाएगी आह ।
Armin Dutia Motashaw