ये रात हैं
या तुम्हारी ज़ुल्फें खुली हुई हैं...?
हैं चाँदनी तुम्हारी नज़रों से मेरी राते धुली हुई हैं
ये चाँद हैं, या तुम्हारा कंगन....?
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल...?
हवा का झोंका हैं या तुम्हारे बदन की खुशबू...?
ये पत्तियों की हैं सरसराहट के तुमने चुपके से कुछ कहा हैं..?
ये सोचता हूँ कब से गुमसुम...कि - जबकी मुझको भी हैं खबर...
कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो.....
मगर ये दिल हैं कि कह रहा हैं
तुम यही हो, यही कहीं हो...Pagal