My New Poem...!!!
ये तो सहनशक्ति की मिसाल है कि सब
कुछ कर भी फूल कुछ नही कहते...
वनाँ एसे ही कभी, कांटों को भी मसलकर
तो दिखाइये साहब .....
काश बेड़ीयाँ पैरों में नहीं होती दंभ आडंबर
व रस्मों-रिवाजों की .....
तो बेटियाँ सदीओ पहले ही शायद जरुर
छु लेती उड़ानों से आसमाँ को ...
चने लोहे के चबाना आसान तो हरगिज़ नहीं
फ़िर भी चिंत किए बड़े सुरमाऔ को ....
है कोन-सी मंज़िल जो ना छुईं महिलाओं ने
सुनीता ने तो डंका बजाया अवकाशों में ....
फिर भी आज पानी के मोलभाव नीलाम हैं
ईजजत हर तीसरे-चौथे गाँव शहरों में ...
रब करे प्रभु ही कोई चमत्कार दिखाए ताकि
सामंत आए पापी भेड़ियों कि ....!!!
✍️🌴🌹🌲🖊🖊🖊🌲🌹🌴✍️