ए ज़िंदगी
तेरी मेहरबानियों में जी रहा हूँ ,
हर साँस बहोत मुकम्मल से ले रहा हूँ ,
बड़ी मोहबत्त से तुझे गले लगा रहा हूँ ,
तेरा हर रस पी रहा हूँ ,
तुझे अपने दोनों हाथों से महसूस कर रहा हूँ ,
खुली आँखों से सपने देख रहा हूँ ,
खुले नीले आसमान में उड़ रहा हूँ
सच बताऊं
तेरे बनाये इस मायाजाल को भेद रहा हूँ ,
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में भी
कृष्ण के प्रेम रस में जी रहा हूँ ,
बार बार हार रहा हूँ
फिर भी लड़ रहा हूँ
इस उम्मीद में कि हर पल जीत रहा हूँ ,
में हर दर्द सह रहा हूँ ,
हर चुनौती स्वीकार रहा हूँ ,
ए ज़िंदगी
तू जैसी है वैसी ही स्वीकर रहा हूँ ,
में अब इस दुनियाको बदलना नही चाहता
में खुद ही बहुत बदल गया हूँ ,
में अगली ज़िन्दगी के बारे में सोचता भी नहीं
इसी जिन्दगी को आखरी मन रहा हूँ ||
कविता के रचनाकार:
वेद चन्द्रकांतभाई पटेल
२४,गोकुल सोसाइटी ,
कड़ी ,गुजरात
Mob.-9723989893