तुम्हीं पुण्य प्रकाश हो,
तुम्हीं गगन विस्तार हो,
तुम्हीं धरा की व्यवस्था
तुम्हीं विराट सिद्धांत हो।
अकेले चला था जब
तुम्हीं पुरूषार्थ अभेद्य थे,
भूख जब सत्य की थी
तुम्हीं देवस्वरूप अन्न थे।
प्यार के लिए ही
युगों का विस्तार है,
मनुष्य भी,देवता भी
पंक्तिबद्ध चल रहे हैं।
आदि भी,अन्त भी
तुम में समाया है,
तुम्हीं प्रचण्ड तेज हो
तुम्हीं शान्ति में अखण्ड हो।
**महेश रौतेला