My New Poem ...!!!!
दिल में एक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नयी है अभी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
शहर की बेचराग़ गलियों में
ज़िदंगी तुझ को ढूँढती है अभी
सो गये लोग इस हवेली के
एक खिडकी मगर खुली है अभी
बे-दाग किरदार ख़्वाब-से हो गए
पर कहीं शमँ-औ-हया बाक़ी है अभी
पत्थर नज़र 🧿 से पीग़लते थे कभी
प्रभु-शरणार्थियों की बस्ती कुछ है अभी
कहते है जहां ख़त्म हो जाएगा,प्रभु-रटन बंध
जब हो जाएगा,प्रभु-रटन कहीँ ज़ारी है अभी
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