My New Poem...!!!!
पंछियों से क्या पुछते हो पिंजरे का आलम,
वतन की बेटियों से पूछो कैद क्या होती है
महफ़ूज़ तो परिंदा भी नहीं यारों आजकल
परवाज़-ए-उड़ान मकाँ-ए-उरूज को छूने से
पहले ही ज़ालिम शिकारी पंख काट देते हैं
जीएँ तों कोई बेटी क्यू कर जीएँ यहाँ तो
हर रिश्ते के मुखौटे में भेड़िये छिपें फिरते हैं
हुक्मरान ही बेड़ियाँ समुदायों कि पहनें नापते हो
गर जुर्माने का भुगतान तो गुनहगार से क्या कोई
हिसाबों का सज़ाओं का सिला तलब करे
प्रभु भी दे-कर दौर ढीली आज़माएँ दामन-ए-शबर
शायद इसीलिए फ़रिश्ते से रहा अफ़ज़ल इन्सान बशर