सूरत और सिरत में फर्क न कर पाए हम ।
ना जाने सूरत पे मर मिटे या सिरत पे ।
जुड़े कुछ इस तरह हम उनसे की ;
जुदा होकर भी जुदा न हो पाए ।
न जाने कोन सी कशिश थी उन आंखों में ??
नाही संभल पाए : और नाही बिखर पाए
आज सोचते थे हम ये की क्या था वो ?
कोई प्यार या कोई दिलकश छलावा ?
जिससे नाही जी पा रहे है और नाही मर पा रहे है ।
Dr.Divya