एक कोना मेरा हो जहां मैं बैठना चाहती हुं
सबकुछ भूल के सुकुन से आसमान देखना चाहती हुं।
हाथ में चाय और पेन लेके कुछ लिखना चाहती हुं
शब्दों की भूलभुलैया में युही खोजाना चाहतीं हुं
एक कोना मेरा हो जहां मैं बैठना चाहती हुं।
अल्फाज़ मेरे तितर-बितर से हो गए हैं उसे जोडना चाहती हुं
अल्फाज़ो के सहारे ही सही युही मेरे सपनों को जोडना चाहती हुं
ऐक कोना मेरा हो जहां मै बैठना चाहती हुं।
देखती हुं सोचती हुं बीखर जाती हुं
सबकुछ याद करके खुद को भूल जाती हुं
ऐक कोना मेरा हो जहां मैं बैठना चाहती हुं।
-जिज्ञासा राठोड