Present scenario in many states of country......
"बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल,
सब इकट्ठा कर रहे हैं छत पे पत्थर आजकल।
शहरभर की नालियाँ गिरती हैं जिस तालाब में,
वो समझने लग गया खुद को समंदर आजकल।
कतरनें अख़बार की पढ़कर चले जाते हैं लोग,
शायरी करने लगे मंचों पे हाकर आजकल।
उग रही हैं सिर्फ़ नफ़रत की कटीली झाड़ियाँ,
भाईचारे की ज़मीं कितनी है बंजर आजकल।
अब मुझको हैं अँधेरे इसलिए बेहद अज़ीज़,
अपनी परछाईं से लगता है बहुत डर आजकल।
ऐ ज़ालिम दुनिया वालों पीने दे मुझे शराब बेझिझक,वरना,
ये हालात-ए-वतन देख,पैमाना मेरे आँसुओं से भर जाएगा।"