स्फूमैटो
"सुनो! तुम्हें बारिश में भीगना पसन्द है न?"
"नहीं, मुझे बारिश में भीगना पसन्द था।" था शब्द उसने कुछ जोर देकर कहा और मैं खुद को उसका अपराधी महसूस करने लगा।
मेरी नज़र ड्राइंग रूम में लगी मोनालिसा की तस्वीर पर ठहर गयी। वह पहले मुस्कुरायी, फिर मुस्कान फीकी हुई और फिर हँसी गायब और चेहरे पर उदासी छा गयी। न जाने क्यों, मुझे अंशु और मोनालिसा के चेहरे में साम्य प्रतीत हुआ। शादी के चार साल तक अंशु के चेहरे पर मुस्कान खिली रहती थी। धीरे धीरे वह फीकी होती गयी।
"इस बार हम कपल गरबा खेलने चलेंगे।"
अंशु की बात को मैंने नकार दिया था "ये सब बकवास मुझे पसन्द नहीं।"
"किन्तु.. शादी के पहले तो आप.." उसके चेहरे पर उत्साह का रंग आश्चर्य और निराशा में बदल गया।
"मेरी भोली अंशु! तुम पहले प्रेमिका थीं अब पत्नी हो, और फिर तुमने कभी सुना कि मछली पकड़ने के बाद मछुआरे ने उसे गोली खिलायी?" कहीं सुना हुआ चुटकुला उछालकर खुद को विद्वान समझने की भूल में उसके चेहरे के बदलते रंगों पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया था, या शायद अनदेखा कर दिया था।
अंशु.. उत्साह से लबरेज़ और जिंदगी को खुलकर जीने वाली, कब मेरी नज़रों से दिल में उतरती चली गयी, और उसे पाने के जुनून में खुद को भूलकर मैं उसके रंग में रंगता गया, कभी जान ही नहीं पाया। शादी के बाद मैंने अपना मुखौटा उतार फैंका। अब वह मुझे भारी लगता था, लेकिन मैं अंशु के चेहरे पर चढ़ते मुखौटे को देख नहीं पाया।
हम दोनों एक थे, किन्तु अलग अलग रंग में रंगे हुए। अंशु को पाना मेरा लक्ष्य था, पूरा हो गया। उसे खुश भी रखना था, भूल गया। क्या इसी अंशु से मैंने प्यार किया था? वह बदल गयी थी, इसका कसूरवार मैं था। मैंने उसे जो सब्जबाग दिखाए थे, उन्हें सूखता देख वह भी मुरझाने लगी थी।
"सुनो! मुझे तुम्हारे साथ बारिश में भीगना पसन्द है।" मैं अंशु का हाथ पकड़कर बाहर ले आया। हम दोनों हाथों में हाथ लिए रेन डांस कर रहे थे.. उसके चेहरे पर उदासी का रंग पानी में घुलकर बह रहा था.. उसके अंदर से वही पुरानी अंशु झाँक रही थी.. मैंने देखा एक नया रंग.. प्यार का, विश्वास का, उल्लास का....
........और फिर लियोनार्दो दा विंची को स्फूमैटो कौशल के लिए धन्यवाद देकर मैं अंशु के साथ उसी में खो गया...।
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(26/10/2018)