My New Poem...!!!
जब कुछ कह नहीं में पाती तो
में बस खामौश ही रह जाती हूँ
लफ़्ज़ों से कभी ज़बरदस्ती नहीं
कर उनका एहतराम भी करती हूँ
जज़्बात होंठों तक आ कर लौट
तो जाते है पर दस्तक दिल की
ख़यालों के महलमें क़ैद रखती हूँ
भारतीय नारी हूँ मर्यादा संस्कृति
संस्कार ख़ानदानी लाज निभाके
बाबूलका सर सदा उँचा रखती हूँ
अबला अनपढ़ अज्ञानी बेचारी
जैसे पुराने ख़यालोंका गला घौट
विकासशील पथ खौंजती रही हूँ
प्रभु की अज़ीम-औ-अकल्पनीय
रचना होने का सौभाग्य प्राप्त कर
इन्सानी नस्लोंकी फ़सल बौती हूँ
ख़ुद अपनी परवाह-औ-अहसास
से परे हो कर घरके हर छोटे-बड़े
बंदेकी तमन्ना को अँजाम देती हूँ
“रुँहो” से “रुँहो” का नाता ज़ौड
एक नयी “रुँह”को जन्म देती हूँ।
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