चिन्ता
चाहती आकाश छूना हैं उचक कर कोपलें,
इन प्रयासों का है मतलब भू -धरा सब एक हों।
आदमी की गिद्ध दृष्टी से बचाना स्वयं को ,
चाहती है प्रकृति अपना वंश बढ़ते देख लो।।
देख लो उन ताड़ वृषों की नियति में क्या लिखा,
जिनका एक अल्पांश शायद ही हो आता काम में।
फिर भी जीतें हैं प्रदूषण को मिटाने के लिए,
जब की आकर्षण नहीं संवेदना है चाम में।।
तोड़ कर जो फूल खुशबू वाले, कलियाँ, कोपलें,
करते हैं श्रृंगार प्रियतम का और अपने देव का।
फिर मसलकर फ़ेंक देते हैं उन्हें अगले ही पल,
क्या कोई इसपर लगा सकता है अंकुश देवता ?
नष्ट कर देते हैं बागों को , जड़ों को पेड़ से,
स्वार्थ में अपने उठाता है कदम यह आदमी।
जो वनस्पति और ईंधन ,फ़ल व औषधि दे रहे,
सदियों से खुद मरके जीवन दे रहे वह आज भी।।
मिट रहे इन उपवनों और नवयुगी परिपेक्ष में ,
धुंध से है आज दूषित हो रहा पर्यावरण ।
आत्महत्या कर रहा इंसान बन अनजान हो ,
दिख रहा है पूर्ण नभ पर स्याह सा एक आवरण।।
प्रार्थना करबद्ध करता हूं इसे अब रोकिये ,
संतुलन बिगड़ा तो केवल जीव मारा जाएगा ।
पालने वाली प्रकृति संहार यदि करने लगी ,
क्यों हमारा स्मरण तब मात्र ही रह जाएगा ?