मनुष्य की लालसा अनन्त हैँ उसकेे लालच की पूर्ति से मिलने वाली संतुष्टि अस्थिर होती हैँ जो आगे चल कर और भी अधिक लालच मे परिवर्तित हो जाती हैँ और साथ मे अहंकार जैसे दोष को भी जन्म देती हैँ
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मानव लोभ एक ऐसा राक्षस हैँ जो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाता हैँ और लोभ नामी राक्षस का भकक्षन केवल मानवता हैँ