देहदान
जबलपुर में श्री हरीशचंद्र गौरहार एलायंस इंटरनेशनल क्लब में बहुत सक्रिय सदस्य थे। वे बहुत ही विनम्र, मृदुभाषी, समय के पाबंद एवं क्लब की सामाजिक एवं सेवा कार्यों की गतिविधियों में बहुत सक्रिय रहते थे। वे उच्च शिक्षा प्राप्त कुलीन घराने से थे। एक दिन उनकी अचानक मृत्यु हो जाने पर उनकी पत्नी ने उनकी वसीयत खोलकर बतायी जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से निर्देशित किया था कि उनकी मृत्यु के उपरांत उनके नेत्रदान कर दिये जाए और मृत शरीर का दाह संस्कार ना करके उसे मेडिकल कालेज में छात्रों के अध्ययन हेतु दे दिया जाए।
उन्होंने अपनी यह भी इच्छा व्यक्त की थी कि चूँकि उनका दाह संस्कार नही होगा इसलिये इससे संबंधित सभी संस्कारों को करने का कोई औचित्य नही है और इन सब पर खर्च होने वाली राषि किसी गरीब छात्र को अध्ययन हेतु प्रदान कर दी जाए। उनकी इच्छानुसार उनके परिवारजनों ने इससे पूर्ण सहमत ना होते हुए भी उनकी अंतिम इच्छा की पूर्ति उनकी वसीयत के अनुसार कर दी। स्वर्गीय गौरहार जी की सोच यह थी कि हमारे शरीर का जितना सदुपयोग हो सके उसे करना चाहिए। मृत्यु के उपरांत आत्मा तो अनंत में तुरंत विलीन हो जाती है, अब केवल तन ही बचता है जिसे अग्निदाह करके नष्ट करने से अच्छा तो उसका कुछ सदुपयोग करना है।