सच्चा संत
एक सात वर्षीय बालक शहर के एक प्रसिद्ध महात्मा जी के आश्रम में काफी दूर से आता है और उनसे मिलने के लिये बैठ जाता है। महात्मा जी के प्रवचन का समय होने पर वे बाहर आते है और उस बालक को बैठा देखकर उसके पास आकर बडे प्यार व स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरकर पूछते है कि तुम मुझसे क्यों मिलना चाहते हो ? वह बडी ही विनम्रता से कहता है कि मेरी छोटी बहन बीमार है, मुझे नही पता उसे क्या हुआ है पर उसका आपरेशन करना बहुत जरूरी है। मेरे पिताजी के पास इतना धन नही है कि वे यह खर्च वहन कर सके और उसकी जान बचा सके। मेरी माँ ने कहा है कि अब भगवान ही इसे बचा सकते है। आप भगवान के देवदूत है और अगर आप चाहे तो भगवान से कहकर मेरी बहन को बचा सकते है। मैं अपने साथ यह गुल्लक भी लाया हूँ जिसमें मेरे द्वारा बचाये गये जेब खर्च के रूपये जमा है और वह गुल्लक खोलकर उसमें रखे ग्यारह रूपये दान पेटी में डाल देता है और स्वामी जी की तरफ देखकर पूछता है कि अब आप भगवान से कहेंगें ना।
उस बालक का उसकी बहन के प्रति प्रेम और समर्पण देखकर स्वामी जी भौचक्के रह गये और प्रवचन छोड कर उस बालक के साथ उसके घर पहुँच गये। वहाँ उन्होंने उसकी बहन की हालत देखकर तुरंत चिकित्सालय ले जाकर उसकी चिकित्सा एवं आपरेशन का प्रबंध कर दिया और सारी रकम अपने पास से अस्पताल में दे दी। उस बच्ची को तुरंत आपरेशन संपन्न हो गया और उसकी जान बच गयी। स्वामी जी भी आपरेशन होने तक अस्पताल में ही बैठकर भगवान का नाम जप कर उसके ठीक होने की प्रार्थना करते रहे और चिकित्सको के यह कहने के बाद कि अब उसकी जान को कोई खतरा नही है, वापिस आश्रम चले गये।
वह बालक सबको कह रहा था कि भगवान ने महात्मा जी की बात मानकर उनके माध्यम से रूपये भिजवाकर मेरी बहन की जान बचा ली। महात्मा जी को जब बच्चे के मन की यह बात पता हुयी तो उनके चेहरे पर असीम प्रसन्नता एवं खुशी का भाव आकर असीम संतुष्टि व तृप्ति का अहसास हुआ।