शहादत और समाज
रणभूमि में हमारी रणसेना रण के लिए किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार खडी है। युद्ध का बिगुल बज गया और शांत घाटी में गोलियों, तोप के गोलों और मानवीय ललकार की गूंज गूंजने लगी। भारतीय सेना ने यह प्रण करके कि हम दुश्मन की भूमि में घुसकर उन्ही के अस्त्र शस्त्रों को कब्जे में लेकर उनको पराजित कर देंगे। उन्होंने शंखनाद करते हुए उनके हमले का प्रत्युत्तर दिया और उन्हें परास्त करके उस चौकी पर अपना कब्जा कर लिया। हमारी सेना को इस बात की खुशी थी कि दुष्मन सिर पर पांव रखकर भाग गया पर उन्हें इस बात का दुख भी था कि हमारे कुछ सैनिक युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गये।
उनके शव यथोचित सम्मान के साथ उनके घरों पर पहुँचाये गये। तब आसपास के पूरे कस्बे के लोग उनके नाम की जय जयकार करते हुए उनकी शहादत अमर रहे के नारों के साथ भारी भीड उन वीर सैनिकों के अंतिम संस्कार में शामिल हुयी। उन्ही वीर सैनिकों में से एक सैनिक रवि की पत्नी एक ओर जहाँ गमगीन थी वहीं दूसरी ओर मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने पति के शहीद हो जाने पर गर्व का अनुभव भी कर रही थी। उसके माता पिता ने अपना बेटा, पत्नी ने अपना पति खो दिया और उसकी एकमात्र दो साल की बच्ची आज अनाथ हो गई। शवयात्रा में शामिल सभी लोग उनके परिवारजनों सांत्वना देते हुए अपने अपने घर चले गये। उन्हें कुछ समय के बाद केंद्रीय शासन एवं राज्य शासन के द्वारा अनुदान राशि प्राप्त हो गई। जिसका उपयोग उन्होने अपने परिवार के लालन पालन एवं बच्ची की शिक्षा हेतु कर लिया।
बीस वर्ष के उपरांत जब वह बच्ची बडी हो गयी तो उसके विवाह के लिये उपयुक्त वर खोजना प्रारंभ हुआ और उनके परिवार को यह जानकर बहुत दुख क्षोभ और आश्चर्य हुआ कि समय में इतना परिवर्तन हो चुका था कि अब उस बच्ची के पिता की शहादत लोग भूलकर, दहेज के लोभी हो चुके थे। जहाँ भी उसके रिश्ते की बात होती वहाँ पर उसकी उच्च शिक्षा, व परिवार को शासन द्वारा प्रदत्त मेडल की परवाह ना कर दहेज की माँग पहले रख दी जाती। उनका परिवार अपनी बच्ची की शादी किसी भी दहेज लोभी के साथ करने के लिए तैयार नही था। उनके मन में अपनी बच्ची की सुंदरता और गुण देखकर बच्ची की शादी किसी उच्च कुलीन घराने में करने की प्रबल अभिलाषा थी परंतु अंत में यह संभव ना होकर एक कम पढे लिखे मध्यमवर्गीय परिवार के लडके के साथ जिसकी दहेज की कोई माँग नही थी के साथ संपन्न करना पडा।
दहेज की यह कुप्रथा आज भी समाज को मानसिक गुलामी में जकडे हुये है जिससे समाज के प्रतिभावान बच्चे धन के अभाव में अपेक्षित वर को ना पाकर समझौतावादी दृष्टिकोण को अपनाकर मन को संतुष्ट कर लेते है।