Hindi Quote in Poem by Mukteshwar Prasad Singh

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यादों की झोली
भूली बिसरी बातें
हर रोज मुझे डुलाती हैं।
अपनी यादों की झोली से
अनगिन चित्र दिखाती हैं।
चाहे-अनचाहे बरबस
उन चित्रों में खो जाता हूँ।
छुटपन की हर इक आदत
तरतीबी से सजाता हूँ।
...जाड़े के दिन थे वे,
मैट्रिक की जब तैयारी थी।
हर घण्टे दिन रात,
चलती खूब पढ़ाई थी।
पछुआ हवा के साथ घुली
माघ माह की ठिठुरन,
सर्द भोर की तन्हाई में,
उठकर पढना लिखना मजबूरन।
अंधेरे में टटोल टटोल
ढूंढ लेता सलाई तीली,
लालटेन की बत्ती जलती,
रोशनी मिलती पीली।
ले अंगराई बाहर आता,
सिर पर तीनडोरिया तारा देख,
साढ़े तीन अनुमान लगाता।
इसी भोर की ताजगी में
लगातार पढ़ता रहता।
चारों तरफ नीरवता रहती
साथ में कलम काॅपी होती।
और मेरे दादा की खांसी
तन्हाई में हिम्मत देती।
बीच-बीच में टोका टोकी-
‘‘पढ़ते हो कि सोते हो"
झपकी से मुक्ति देती।

लगातार पढ़ते पढ़ते
थोड़ा मन उचट जाता,
तभी सहपाठी की आहट पर
दरवाजे के बाहर आता,
अलाव की लहकती आग के पास
चादर ओढ़े ओढ़े फुस-फुस बतियाता।
फिर उठकर चलने से पहले,
घूरे को ऐसे ढ़ंक देता,
ताकि दादा जान ना पाये
किसी ने अलाव को उकट दिया।
गाँवों में भोर की यही पढाई
छात्रों को तीक्ष्णता देती।

सुबह की लाली दिखते ही
किताब कापी समेट सहेज कर
निकल पड़ता फिर नित्यक्रिया पर।
रोज रोज़ होता यूंही,
मेरे दिन का आगाज,
गांव से दो कोस दूर मेरा था
हाईस्कूल का मंज़िल आबाद।

दस बजे से पहले पहुँचना,
पैदल रोज आना जाना,
शरीर का हो जाता व्यायाम।
न बूशर्ट और ना पतलून,
पजामा कमीज वाला अफलातून,
स्कूल कक्षा में होता विश्राम।

पहले प्रार्थना, फिर हाजिरी,
शुरु होता पढ़ने का काम
शिक्षकों के शिक्षण से ही
मिलता भरपूर ज्ञान निष्काम।
गांवों की यह शिक्षा दीक्षा,
आज भी मेरे लिए वरदान,
ग्रामीण लिखाई पढ़ाई ही,
किया मेरा अस्तित्व निर्माण।


-मुक्तेश्वर मुकेश

Hindi Poem by Mukteshwar Prasad Singh : 111284416
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