जिस पर था विश्वास अगाध,
उसी ने भरमाया मुझे।
गर्व था जिसके आने के बाद,
उसी ने आजमाया मुझे।
शहर था भीड़ से आबाद,
मगर वही शख्स भाया मुझे।
परिचित समझ थाम लिया हाथ,
वही अपरिचित पथ पर लाया मुझे।
जिससे नाता हुआ बेहद खास,
उसी ने हर पल तड़पाया मुझे।
पल दो पल का रहा साथ,
और जिंदगी भर रूलाया मुझे।
भुला देने का बहुत हुआ प्रयास,
वक़्त-बेवक्त मगर याद आया मुझे।
अहम् क्यों आज भी उसी की बात,
जिसने स्वयं से किया पराया मुझे!