मेहफ़िले सजती रही समां बनता गया,
तू नहीं आया,
तो क्या फर्क पड़ता है...
चिराग़ बहोत जल रहे थे महफ़िल में,
एक दिया कहीं और रोशन होता रहा,
तो क्या फर्क पड़ता है..
उनकी यादों के ढ़ेर लगाए बैठे है हम यँहा,
फिर भी उनको हिचकी न आई,
तो क्या फर्क पड़ता है..
फ़ितरत में मेरी हारना कभी नहीं है,
पर उसे जित से रुसवाई है,
तो क्या फर्क पड़ता है..
तबियत सुस्त रहा करती है आज कल,
शायद उसने दी हमारी मौत की दुहाई है,
तो क्या फर्क पड़ता है...
खुदगर्ज न तुम थे,खुदगर्ज न हम थे,
खुदगर्जी किस्मत ने दिखाई है,
तो क्या फर्क पड़ता है....
@अद्वैत