सुदंर कविता ..
विषय .दर्पण ..
दर्पण कह रहा है ,कितने बदल गये हो यार ।
कल तलक पत्थर से थे ,आज मोम से बन गये हो यार ।।
अपनी सुदंर झलक मेरे ,में देखने अति आतुर हो यार ।
कभी अपने भीतर छिपी ,गदंगी को क्यूं नही देखते यार ।।
बाहर कि सुदंरता कुछ नही ,भीतर की सुदंरता सजाऐ यार ।
किसी रोते हुए के आंसू पोछो ,भुख से तडपते को निवाला दो यार ।।
बहुत सज लिए अपने खातिर , अब थोडा दूसरे के लिए सजो यार ।
जरा सी ठेस लगते ही ,बस झर् झर् आंसू बहाते हो यार ।।
क्या बिका है इन दिनों इतना खुश हो ,दाम जमीर के अच्छे मिल गये है यार ।
फटेहाल थे तुम कल तलक ,कालिख से कितने निखर गये हो यार ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,अमदाबाद ,गुजरात ।