इन दिनों जब मैं कहीं नहीं थी
तब एक समय में कई अनुभवों में थी
अनुभवों को सींचकर
मैं एक लाइब्रेरी बनने की चहा कर रही थी
जिसकी नींव में अक्सर कई
गहरी कहानियां ठहरी रहती है
जो मन के तल को पलट कर
उस पर प्रेम की हरी घास उगाती है
या उदासी का सूखापन
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अनुभव मन पर पड़ी एक शुष्क
घड़ी है जो छुपी है मन के कोने में
और शरीर की चमड़ी की हर एक कोशिका
में तंरगित होकर बहती रहती है
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उन दिनों तुम्हरा होने और न होने के बीच ने
अनुभवों को भेद दिया
ऐसा होना भी जरूरी था
आखिर सब रिश्ते एक मयाद के साथ आते हैं