जब भी बात तुझ से हुयी
तड़पी मैं, रात खुद से हुयी।
जब भी घन धरा की हुयी
रोयी मैं, बारिस खुद से हुयी।
जब भी जवानी प्रेम में हुयी
रही मैं, कहानी खुद से हुयी।
जब भी छुआ उसने मुझे
भड़की मैं, पानी पानी हुयी।
जब भी नयनों में लड़ाई हुयी
जीत गयी मैं, हारी हारी हुयी।