सुदंर रचना ..
विषय .निर्मलता ..
धुला हैं जहर हर नदियों में ,तो पावनता कहाँ ढूँढू ।
लगी हैं आग नफरत की धर धर में ,तो शीतलता कहाँ ढूँढू ।।
भुख की लोरी सुन कर सो गये बच्चें ,मजबुर माँ की ममता कहाँ ढूँढू ।
मोबाईल की गलियों में खो गये बच्चें ,बचपन की शरारत कहाँ ढूँढू ।।
यहाँ सभी के हाथ में हैं खजंर ,मैं मानवता कहाँ ढूँढू ।
लेखनी खो गयी चाटुकारिता में ,हकीकत कहाँ से ढूँढू ।।
मनुष्यता हो गयी धायल ,सभी नफरत उगलते हैं ।
हृदय हो गया पत्थर सा ,कोमलता कहाँ ढूँढू ।।
केवल स्वच्छता दिखावा रह गया अखबारों में ।
विचारों में है प्रदुषण ,निर्मलता अब कहाँ ढूँढू ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।