श्री बंकिम मरजादी के सौजन्यसे ?
इस फ़रेब खाने (FB) में....
"फिर लौट के आये हैं चले थे जहाँ से हम,
आये हैं यहाँ ढूंढने खोया हुआ बचपन।
अपनों को छोड़ कर के पहली बार आये थे,
आँखों में सपने हम हसीं हज़ार लाये थे,
आये थे पहली बार सहमे सहमे से गुमसुम,
आये हैं यहाँ ढूंढने खोया हुआ बचपन।
दो - चार दिन में दोस्त बने थे जो अजनबी,
यूँ लगने लगा था के ना बिछडेंगे हम कभी,
और वोभी दिन आया के जुदा होंगे सब हम,
आये हैं यहाँ ढूंढने खोया हुआ बचपन।
हम सबने एक अपनी ही दुनिया बनायी है,
ज्यादा हो या थोड़ी हो, मुहब्बत कमाई है,
ये सब भुला के दो घड़ी बैठेंगे साथ हम,
फिर लौट के आये हैं चले थे जहाँ से हम,
आये हैं यहाँ ढूंढने खोया हुआ बचपन।"