ગઝલ
ज़िक्र-ए-यार लब पे और दीदार खयाल में है,
तब से ही ये दिल और दिमाग बवाल में है ।
महफ़िल-ए-समां में देखा आज मुस्कुराते उसको,
लगता है उसका दिल भी मेरी तरह कमाल में है ।
फिर भी रहते है खुश ज़माने को दिखाने के लिए,
दिखा नहीं सकते अश्क जो छिपें रुमाल में है ।
जानता हूँ खुश तो नही वह और ना बेवफा है,
कैसे चिर के दिखाए हमारा दिल भी मलाल में है।
तो क्या हुआ 'आर्यम्' वह दर्द अपना दिखाते नही,
हम जानते है छिपाए दर्द वह अपने जमाल में है ।
भावेश परमार 'आर्यम्'
Thanks.