ठोकरों में अस्मिता अब न रहेगी।
मातृ सत्ता भी अब फूलेगी फलेगी।।
तीन शब्दों में न सिमटी रहेगी जिंदगी।
भोग्या की भ्रांति अब पानी भरेगी ।
छीनते जो नारियों के हास प्रद क्षण ।
है नियम करता उन्हें अब है निरुत्तर ।
धारणाओं को जो शाश्वत मानते थे।
है कुठाराघात उनकी भावना पर ।
जन्मदात्री शक्ति के उत्थान का दिन ।
मातृशक्ति है तेरे सम्मान का दिन ।
घाव तूने जो कलेजे पर सहे थे आज तक ।
आज है उसके हे माँ अवसान का दिन ।
यह धरा अब वेदना को न सहेगी ।
सूखे ओठों पर हँसी बहती रहेगी ।
रक्त तेरा जिन नसों में दूध बन,जाता रहा ।
बन पशु माँ वह तेरी बोटियाँ खाता रहा ।
जन्म पाकर धन्य होने की जगह पर ।
माँ तेरे आँचल को ही कलुषित किए जाता रहा ।
भोग पीड़ा मृत्यु की जो मनुज का विस्तार करती ।
दिव्यता की मूर्ति बन कष्ट का प्रतिकार करती ।
विश्व में संवेदना का तू प्रथम अध्याय है माँ।
फिर भला तू कब तलक अपने पर अत्याचार सहती ।
तू हमेशा अक्षत अविरल,तरंगायित रहेगी ।
तेरे चरणों मे धरा सुरभित सुगंधित ही रहेगी ।।