खुद को संभाल ना भी नही आता हमे उन के सिवा, अब ना ही कोई गिला है किसी से और ना ही कोई शिकवा।
नाराजगी बस इतनी ही है खुद से की अपने किये वादे निभा ना सका, हर बार वक़्त का मारा मैं तुझे मिलने आ ना सका।
अब तुम नही तो ऐसा है जैसे बारिश में खड़ा हूँ मगर भीग ना रहा हु मैं बस अपनी ही आग में सुलग रहा हु मैं।
वही पुराने से गीत गुन गुना रहा हु मैं वही सारि जगहों पे जा रहा हु मैं , शायद कही तुम मिल जाओ शायद कही दिख जाओ, गर अब ये मुमकिन नही।
वक़्त का एक सहलाब आया और तिनको में सारे ख्वाब बिखर से गये उस वक़्त अपनी लाचारी का अहसाह हुवा , की इंसान कितना छोटा है तू लाख करले कोशिश मगर तेरे बस का न कुछ है अरे न कभी होगा ।
सब खेल है एक जादू का, जादूगर दिखे न कोई, सब कर ना चाहे मन कि, पर मन की कभी न होई।
#जादू का खेल By
-शून्य सा