भौंह की कमान से न बान यों चलाइये।
चाह की निगाह से न ध्यान यों डिगाइये।।
पी चुके समुद्र जो अमिय गरल सहित यहाँ।
हुस्न के जमाल से न जाम यों पिलाइये।।
हम कोई विश्वामित्र नहीं जो हुस्न आँच में जल जायें
मधु पी कर तृप्त पुजारी हैं तप भंग नहीं होने वाला
Kuber Mishra