ज़िन्दगी की उलजनो में कितने उलझ गए वो आज पता लग रहा है जब एक उलजन सुलटाते बैठे हुम्,
धागे सुलट ते नही, डोर काट सकते नही,
वक़्त रुकता नही और हुम् रुक गए वही,
डोर हाथ मे थी तब बिन सोचे लपेट ते गए,
और आज, नतीजे से मुख मोड़ सकते नही
देर तो हो गई अब पर घड़ी के कटे उलट सकते नही,
रोज़ हिम्मत जुटा ने की कोशिश में लगते है
लड़ाई खुद से है इस लिए थक सकते नही,
मंज़िल कीतनी मुश्किल होगी वो बगेर जाने
राह चुनी ली थी, अब वापिस लौट सकते नही,
ज़िन्दगी की उलजनो में कितने उलझ गए वो आज पता लग रहा...