माना मैंने भूल कर दी तुझसे दिल लगाने में,
मगर इक उम्र तो ठहर जाओ मेरे आशियाने में।
बड़ी मेहनत से बनाया है मैंने दिल का महल,
थोड़ा तो तरस खाओ तुम इसको जलाने में।
मालूम कहां था कि तुम मौसमों से बदलते हो,
मगर अभी तो सावन हैं देरी है पतझड़ आने में।
तमाम उम्र तेरे जाने के बाद हम इंतजार करेंगे,
गर आओ तो हमे ढूंढ़ लेना किसी शराब- खाने में।
कहते हैं भूल जाना कितनी देर लगती है भूल जाने में,
"सत्येंद्र" इक उम्र बीत जाती हैं पत्थर को दिल बनाने में।।
-- Satyendra prajapati
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