न सहर है न शाम है,
काफिर की पिटाई सरेआम है,
न दंगे है न लड़ाई है,
हमारे शहर में कत्लेआम है,
न दोस्त हैं न दुश्मन है,
फिर ये कैसा इंतकाम है,
न भजन है न आज़ान है,
हमारी बस्ती में कोहराम है,
न सुख है न सुविधा है,
हमार्रे घर में इब्तिसाम है,
न धन है न दौलत है,
फिर भी हमको आराम है,
न ग़ज़ल है न नज़्म है,
"पागल" ये तो कलाम है।
✍?"पागल"✍?
सहर - सुबह
काफिर - उत्पाती, उपद्रवी
इब्तिसाम - मुस्कुराहट