Megha in matrubharti
विषय:५ जून पर्यावरण दिवस
एक पौधा जरूर लगाए ।
जा रही हूं मै, मै जा रही हूं।
मन में बोझ लिए, डबडबाई आंखों में अश्कों कि कतार लिए बस,
जा रही हूं मै,मै बस जा रही हूं।
और कितने जुल्म सहन करू,अत्याचार की भी अब तो सीमा परे,
निश्तेज, अशाध्य, अक्षम्या,मेरे पार्थिव शरीर को बिन आधार लिए बस,
जा रही हूं मै, मै बस जा रही हूं।
कभी मुझ पर भी वसंत आईं थीं,
सोलह श्रृंगार किए में भी लज्जाई थी,
उन विहाग के सुरमई ताल पर थिरकी थी,
उन अल्हड़ बादलों के संग संग झूम लहराई थी,
मदमस्त बसंती संग गुनगुनाई थी,
आंधी तूफान सा आए प्रदूषण को अपने कोख मै संजोए
जा रही हूं मै, मै जा रही हूं।
अब भी एक आस हे तुम से मुझे,
देख लो फिर वो ही प्यार से मुझे,
रोक लो बिखर ने से तुम मुझे,
न रह पाऊंगी तुम बिन एक पल भी।
कर लो एक वादा फिर से तुम मुझ से,
बस रोक लो मुझे,,,,,
तुम्हारी प्रकृति।
मेघा....