रूह की चाहत है वस्ल ए रात की
न जुस्तजू है कोई माहताब की।
ढूंढते हैं वे सकूं औ इश्क हुस्न में
परवाह किसे है जाने जनाब की।
रुखसार भी महके है, दिखते गुलाब से
महसूस हम करते हैं खूशबू जनाब की।
हम रहते है गुमां में उनके ही इश्क के
वह सुरखाब बन गई है अपने ही ख्वाब की।
लिखते हैं बज्म भी उनकी निगाहों पे
वह तकदीर बन गई मेरे सवाब की।
दिव्या राकेश शर्मा।