इत्तीसी बातपर तुम खफा हो गये।
जुदा होके मुझको सजा दे गये।
कैसी नाराजगी, कैसा अल्लडपण
किस बातपर ये कैसी अनबन।
कैसे समजावु, कैसे बतलावु
उस बातपर मैं सफाई दिलावु
कमजोर विश्वासपर जिंदगी नही कटती
सच्चाई की दीयाबाती कभी नही बुझती
अपने जज्बात को ठठोल ले जरा
दिल की बात सुन, न कर फैसला
कही ये लम्हा दुरीया ना बनाले
पलट देख जरा, हाथ तु थाम ले
वरना सारी जिंदगी पछतायेगी
प्याराकी नय्या डुब जायेगी