क्या पता है तुम्हें आज कल अपनी बात नही होती, हो सकता है इसे तुम्हें कोई फर्क न पड़े लेकिन हमारी तो रात नही होती क्या पता है तुम्हें आज कल अपनी बात नही होती ऐसा लगता है हमारे महोले में अब बरसात नही होती, अब लगता है कुछ अधूरी रहे गई प्यास हमारी क्योकि अब हमारे यहां सावन में भी बरसात नही होती क्या पता है तुम्हें की आज कल हमारी बात नहीं होती।
वीरान थे हम वीरान ही रह गए लगता है अब हमारी महोले में किसी से ऐसी पहचान नही होति, क्या पता है तुम्हें आज कल अपनी बात नही होती,
क्या पता है तुम्हें हमने कभी न खेले थे हमने होली के त्योहार, क्योकि बेरंग थे हम तो आपने आकर हमे रंग दिये ओर हमे रंगा रंग कर गये।रंग जो दिये आपने बस इन्हें एक ही बार में दुआ कर गए, कभी कभी दम घुटता है हमारे इस मे बताओ क्या करे हम?
क्या पता है तुम्हें आज कल हमारी बात नही होत्ती।
क्या पता है तुम्हें आज कल हमे वो आवाज सुनाई नही देती जो हमारी कानो की सुरंग से सीधे दिल को जाती थी और छू जाती थी हमारे मन को। लगता है आज कल वो आवाज नही होती ।
सब सुने पड़े है रास्ते अब मै उन पर आवाज लगाउ किसे तुम ही बताओ अब पागलसी कहकर बुलाऊ किसे, क्या पता है तुम्हें आज कल अपनी बात नही होती।
✒--- मनीष पारीक
To be continue..........