"ज्ञान गंगा"
तन है यदि विकलांग तो भी
सागर को तू तर जाऐगा...
मन को किया विकलांग तो
फिर पार कैसे पाएगा।
होंसलों के पंख से ही तो
उड़ेगा ऊँची उड़ान तू ....
मन ही छुयेगा आसमां
ये तन धरा रह जाएगा।
असंख्य कांटे हों राह में
हों तरूवर विहीन पगडंडियाँ....
तू धूप से गुजरा नहीं तो
छाँव-ए- लुत्फ कैसे पाएगा।
नजारा वो करता रोज ही
इक दिन नहीं तो न सही...
अमावस ना लाए चाँद तो
क्या आसमां डर जाएगा। ।
ज्ञानी भरा हो घमंड से
किंतु सत्कार का न भाव हो...
प्यासे को जल पिला जो दे
वो मूर्ख पूजा जाएगा।
अंग निधियाँ जिनके पास हैं
किंतु अन्याय होता देख लें....
जो खिलाफ हो अन्याय के
वो दिव्यांग इंकलाब लाएगा।
गर मरणोपरांत ये तेरे
सभी अंग काम आ सकें...
दुनिया से जाकर भी "सुमन"
तेरा जीवन अमर हो जाएगा।
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Bhavin trivedi