जिनसे न था नाता पहले , अब वो अपने हैं
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
राहों में हैं काँटे इतने,जिनपर चलना अब है
हाथों का ही सहारा है ,गिर कर संभलना जब है
खुले आसमां से देखा, अवसर कितने हैं
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
बाते जितनी थी जीवन मे, अब वो पुरानी हैं
भूल चुके ग़म-ए-लम्हो को, बस कुछ कहानी हैं
कोई साथ रहे या न रहे,आँसू अब न बहने हैं
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
वादे जो थे खुद से ,बारी अब निभाना है
उम्मीदों के मुरझाये दीपक,अब जलाना हैं
रौंद चुके अरमानो को, दुःख अब न सहने है
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
कमज़ोर दीवारे हिम्मत की, जड़लौह बनानी है
जीवन जटिल हो कितना, नौका पार लगानी है
हवा के झोंको को है सहना, पत्ते अब न गिरने हैं
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
मार्ग बनाये पक्के सच के, उजयारें ही दर्शन हैं
क्रोध,द्वैष, मोह और माया, सम्मुख सब दर्शक हैं
कठिन रास्ते अपने, मंजिल तक फूल बिछाने है
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
जिनसे न था नाता पहले अब वो अपने हैं
पूरा करने निकले हैं,आँखों मे जो सपने हैं
(आलोक शर्मा )