Megha in matrubharti.
#KAVYOSTSAV -2
विषय:जीवन संध्या।
ए जिन्दगी जरा थम तो जा,
अभी अभी तो बसंत आईं हे
तू पतझड़ के आईने से मुझे ना
डरा।
ए जिन्दगी जरा थम तो जा....
वो नन्ही सी कली अशो की बूंदों से मुस्कुराई थी..
तू रेगिस्तान की धूप से उसे ना झुलसा।
ए जिन्दगी जरा थम तो जा...
वो लहलहाते खेतो सी अल्हड़ जवानी मुझ पे छा ई थी...
तू बंजर जमी के वो नज़ारे ना दिखा।
ए जिन्दगी जरा..
शरद ऋतु की संध्या के धूप की जैसी मै अभी ठहरी ही थीं।
तू अमावस्या के घनघोर अंधेरों सी मुझे ना सता।
ए जिन्दगी जरा थम तो जा...
अभी अभी तो बसंत आई हे
तू पतझड़ के आईने से मुझे ना डरा।
मेघा....✍?