#काव्योत्सव - २
दोस्ती का पैगाम
अनजाने से मंज़र पे , चला अकेला कभी
मिला कोई अजनबी सा लगने लगा है कोई अपना भी
अकेले रेह कर भी ,पाया ना खुद को अकेला कभी
मिला जो साथ तेरा , मोह लिया दिल मेरा भी
विपरीत है दोनों के नाम , पर किया साथ में काम
कभी न की मनमानी, हमेशा रही साझेदारी
भूलूंगा न कभी तेरी बातों को, रखूँगा याद तेरी मुस्कराहट को
ऐसी थी कुछ यारी हमारी, रहेगी सदा यह दोस्ती हम्मारी
- कुमार