शीर्षक :--"शब्द"
शब्दों की महिमा अनंत सदियों से गायी जाती हैं।।
वर्णों की एकल महत्ता
अक्सर इनमें छिप कर रह जाती है।।
मिलमिलकर ही अक्सर
रचते हैं सब नूतन संसार
मैं, मेरा रहता अकेला
सहता पीड़ाएं हजार।।
एकत्व में केवल महिमा शून्य की देवत्व पाती है।।
निजता त्याग करके समरसता से प्रतिष्ठा नंबरों की भी दुगनी, तिगुनी, चौगुनी बढ़ जाती है।।
वजूद स्वयं का प्रतिपल यहां बढ़ाना
स्वयं को रखकर शून्य पडे़गा अनुगामी बन जाना।
सहसोग ने ही सदैव यहां
कुछ नवीन रचा है
अकेला क, ख, ग, भी
कवर्ग में सदैव अकेला पड़ा है।।
स्वरचित मौलिक :--पूनम द्विवेदी (तिलक नगर)13.5.19