चहेरा
बार बार घूमता रहता हैं मेरी आंखों में,
इक मासूम सा मुस्कुराता चहेरा कीसिका।
नहीं पहेचान मुझे उसकी,अंजान हूं मैं उनसे,
फ़िर भी आता है ख्यालों में बार बार वो चहेरा।
चाहता हूं भुला दू उसे,फ़िर भी वो याद आ जाता है,
आंखों में उतर गया वो,अब दिल में उतरता जा रहा है।
नहीं बस में वो अब मेरे,वो चहेरा अपनी मनमानी करता है,
रोकने की कोशिश करता हूं उसे,तो मुझपे हक़ जमाता जा रहा है।
गर कोशिश करता हूं में बाहर निकलने की,वो चहेरा और उलझाता है,
ख़्वाबों ख्यालों, दिल-ए-दिमाग़ पर वक्त के साथ चहेरा अपना हक़ जमाता जा रहा है।
रवि नकुम 'ख़ामोशी'