अधूरा खत
कई दिनों से अलमारी में रखी पुरानी किताबें मेरी आँखों में खटक रही थी, कई बार सोचा इनको हटा दूँ लेकिन... पर आज मै इनको उठा कर झोले में भरने लगा, वो किताबें जो कभी जीने का जरिया थीं लेकिन अब वो महज़ रद्दी बन चुकी थीं मै किताबें हटा ही रहा था कि तभी एक किताब हाथ से छूट कर फर्श पे जा गिरी और खुल गई, उसके खुलते ही मैं मानो कमरे की चार दिवारी से निकलकर किसी और दुनिया में चला गया या यूं कहो अपनी दुनिया मे..
किताब का पन्ना नम्बर 142 और कहानी "अधूरा ख़त" इसी पन्ने के बीच में रखा आधा फटा हुआ खत, जो था तो फटा हुआ पर कहानी पूरी सुना रहा था, उस दिन मुझे ज्यादा देर नही हुई थी इस ख़त को लिखकर उसके अंजाम तक पहुचाने की पर कुछ जज़्बात उन लहरों की तरह होतें हैं जो दिल के समन्दर से उठते तो हैं लेकिन मुहाने तक कभी नहीं पहुंचते l
आज भी इस ख़त के आखिरी में "तुम्हारा" शब्द लिखा हुआ था, "तुम्हारा........" कितना अधूरा और अकेला शब्द था ये, काश इसके आगे मेरा नाम लिख गया होता, पर उस दिन जब तुम नहीं तुम्हारी खबर आई थी, ठीक उसी समय जब मैं उस "तुम्हारे" शब्द के आगे अपना नाम लिखता और हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाता, कहानियां भी अजीब होती हैं, कब किसकी कहानी किस से मिल जाय और किस से अलग हो जाए पता नहीं होता, ठीक इस पन्ना नम्बर 142 की कहानी की तरह, मैंने किताब उठाकर उस ख़त को बार बार पढ़ा और फिर अलमारी में रख दिया जो आज भी अधूरा... था, जो कभी भी "तुम्हारा" न हो सका l