#KAVYOTSAV -2
एक कुर्सी,
मैं,
जलती सिगरेट,
एक पेन,
एक कोरा कागज़,
एक खिड़की,
बारिश को रात के हवाले करती हुई एक शाम,
खिड़की में से बाहर जाता सिगरेट का धुंआ और उसी खिड़की में से अंदर आती हुई गर्मागर्म पकोड़ो की खुश्बू...........
एक बालकनी,
"तुम मेरी सौतन के इंतज़ार में बैठो" कहकर बड़ी बेफ़िक्री से भीगती एक औरत,
एक गहरी साँस,
दो मूंदी हुई आँखें,
कुर्सी के पैरों को जलाती सिगरेट की ऐश,
गालों पर थपकी देती ठंडी हवा.......
एक ख़्वाब,
एक कवि,
एक इंतज़ार,
मेरी दो उंगलियों के बीच गूंजती मरती हुई सिगरेट की एक आख़िरी चीख.....
एक टूटा ख़्वाब,
एक ख़तम होता इंतज़ार,
मेरी पुकार- "सुनो",
उसका सवाल- " कैसी रही मुलाक़ात?"
मेरी ख़ामोशी…...
मेज़ पर झुककर,
मेरी ख़ामोशी को क़रीब से सुनने की कोशिश में,
उस कोरे कागज़ पे उसकी ज़ुल्फों में से गिरती कुछ स्याही की बूंदें,
एक कविता,
एक भीगती रात!!!!!
................................................JaE.